एक अनोखा मंदिर जहां चार सौ वर्षों से लगातार जल रही है बड़े सरकार की धूनी।साढे़ तीन सौ वर्ष से रामलीला मंचन,।।

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कुशीनगर

 सिद्ध पीठ बगही धाम का इतिहास बहुत ही रोचक और अनोखा है। लगभग चार सौ वर्ष पूर्व, यहां घनघोर जंगल हुआ करता था, लेकिन एक संत के आगमन ने इस स्थान को बदल दिया.

जन श्रुतियों के अनुसार, एक संत बाघ पर सवार होकर जंगल में पहुंचे और अपनी धुनी रमाई. इसके बाद से इस स्थान का नाम बगही पड़ गया. दिवंगत पीठाधीश्वर राममणिक दास ने इस मंदिर का निर्माण कराया था, जो आज भी अपनी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है.

मंदिर का निर्माण लाल पत्थरों से किया गया है, जो मिर्ज़ापुर के चुनार पहाड़ी से बग्गियों से ढुलाई कर लाए गए थे. मंदिर में ठाकुर द्वारा, गर्भ गृह और शिव मंदिर हैं, जो अपनी सुंदर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं.

सैकड़ों एकड़ भूमि में फैला हुआ यह मंदिर, अपने तीन दिशाओं में बड़े-बड़े सरोवरों के साथ, एक अद्वितीय सौंदर्य का अनुभव कराता है. यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का केंद्र भी है.

सिद्ध पीठ बगही धाम में जीवंत है 350 साल पुरानी रामलीला की परम्परा

कुशीनगर के नेबुआ नौरंगिया क्षेत्र के सिद्ध पीठ बगही धाम में लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व से चली आ रही रामलीला की परम्परा को आज भी बगैर किसी आधुनिकता के अपनाई गई है। यह रामलीला क्षेत्रीय लोगों और मठ के पीठाधीश्वर के द्वारा जीवंत रखी गई है।

इस रामलीला की शुरुआत दिवंगत पीठाधीश्वर राममणिक दास महाराज ने की थी। यह लीला प्रत्येक वर्ष आश्विन कृष्ण एकादशी से कार्तिक कृष्ण पंचमी तक 22 दिनों तक चलती है। इसमें अभिनय करने वाले कलाकार मंदिर के साधु और पड़ोस के गांव के बच्चे होते हैं।

इस रामलीला की विशेषता है इसकी पारंपरिक शैली, जिसमें धनुष बांस के खोपचे और तीर सरकंडे से बने होते हैं। लीला मैदान में रामलीला का मंचन बगैर तामझाम के भूमि पर होता है। रामसेतु का निर्माण सबसे भावुक क्षण होता है, जिसमें लोग पंक्ति में खड़े होकर सेतु बनाते हैं और भगवान राम और उनकी बानरी सेना गुजरती है।

आधुनिकता के इस युग में भी यहां की रामलीला अपने पुराने वेषभूषा में गांव की परम्परा को संजोये हुए है।

चार सौ वर्ष से जल रही धूनी

अद्भुत आस्था–

400 वर्षों से जल रही बड़े सरकार की धुनी, मंदिर में मिलती हैं मुरादें

सिद्ध पीठ बगही धाम में एक अनोखी धुनी जल रही है, जो लगभग 400 वर्षों से लगातार जल रही है। यह धुनी राजमणि दास ने जलाई थी, जो मंदिर के पास स्थित है।

हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाज के लोग इस धुनी के पास मुरादें मांगते हैं और बड़े सरकार के नाम से पूजा करते हैं। यह धुनी न केवल एक धार्मिक महत्व का स्थल है, बल्कि एक सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।

लोगों का विश्वास है कि बड़े सरकार की धुनी में उनकी मुरादें पूरी होती हैं और वे अपनी मनोकामनाएं पूरी होने के बाद यहां आकर धन्यवाद देते हैं। यह धुनी सिद्ध पीठ बगही धाम की एक अनोखी और महत्वपूर्ण विशेषता है।

एस कुशवाहा की रिपोर्ट

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Author: News Alert 9

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